न्यायिक समीक्षा और न्यायिक सक्रियता

न्यायिक समीक्षा

संवैधानिक प्रावधान

  • भारत के संविधान का अनुच्छेद 13:

    • राज्य को यह निषेध करता है कि वह कोई ऐसा कानून न बनाए जो मौलिक अधिकारों को छीनता या उनका हनन करता हो।
    • सर्वोच्च न्यायालय को ऐसे किसी कानून को शून्य घोषित करने की शक्ति देता है।
  • अनुच्छेद 226:

    • उच्च न्यायालयों को मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए रिट जारी करने की शक्ति प्रदान करता है।
  • अनुच्छेद 32:

    • सर्वोच्च न्यायालय को मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए रिट जारी करने की शक्ति देता है।
    • डॉ. बी.आर. अंबेडकर द्वारा अक्सर इसे संविधान का “हृदय और आत्मा” कहा जाता है।

मूल संरचना की अवधारणा

  • अवधारणा प्रस्तुत की गई: 1973 में केसवानंद भारती बनाम केरल राज्य मामले में।
    • निर्णय: सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि मूल संरचना सिद्धांत संविधान का हिस्सा है और इसे संशोधित नहीं किया जा सकता।
    • मुख्य बिंदु:
      • मूल संरचना में संविधान की सर्वोच्चता, धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र, विधि का शासन और मौलिक अधिकार शामिल हैं।
      • यह एक न्यायिक रूप से निर्मित सिद्धांत है, संविधान में स्पष्ट रूप से उल्लिखित नहीं है।
      • यह संसदीय संप्रभुता के खिलाफ एक नियंत्रण के रूप में कार्य करता है।

परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य

  • महत्वपूर्ण मामला: केसवानंद भारती बनाम केरल राज्य, 1973।
    • मूल संरचना सिद्धांत न्यायिक समीक्षा का आधार है।
    • अनुच्छेद 13 न्यायिक समीक्षा के लिए मुख्य संवैधानिक प्रावधान है।
    • न्यायिक समीक्षा मौलिक अधिकारों की रक्षा और संवैधानिक सर्वोच्चता बनाए रखने का एक साधन है।

न्यायिक सक्रियता

परिभाषा और दायरा

  • न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism) से तात्पर्य उस प्रक्रिया से है जिसमें अदालतें संविधान की ऐसी व्याख्या करती हैं जिससे न्यायिक शक्ति का दायरा बढ़ता है।
  • इसमें न्यायपालिका सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों के समाधान में सक्रिय भूमिका निभाती है।
  • इसकी तुलना अक्सर न्यायिक संयम (Judicial Restraint) से की जाती है, जहाँ न्यायपालिका अपनी भूमिका को कानून के शाब्दिक अर्थ तक सीमित रखती है।

प्रमुख विशेषताएँ

  • सक्रिय व्याख्या: अदालतें संविधान की ऐसी व्याख्या करती हैं जो समकालीन मूल्यों और सामाजिक आवश्यकताओं को दर्शाती है।
  • सामाजिक न्याय: अदालतें अक्सर शिक्षा, पर्यावरण और मानव अधिकार जैसे क्षेत्रों में हस्तक्षेप करती हैं।
  • सार्वजनिक हित याचिका (PIL): न्यायिक सक्रियता का एक प्रमुख साधन है, जिससे व्यक्ति अदालतों में अपनी शिकायतों के निवारण हेतु पहुँच सकते हैं।
  • नए अधिकारों की स्थापना: अदालतों ने संविधान में स्पष्ट रूप से उल्लिखित नहीं किए गए अधिकारों को मान्यता दी है, जैसे—गोपनीयता का अधिकार, गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार आदि।

महत्वपूर्ण मामले और उदाहरण

मामला वर्ष प्रमुख मुद्दा परिणाम
ओल्गा टेलिस व. बॉम्बे नगर निगम 1985 झुग्गी-बस्ती वालों का जीविका का अधिकार जीवन और जीविका के अधिकार की मान्यता
विशाका व. राजस्थान 1997 कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न कार्यस्थल सुरक्षा के लिए निर्देश जारी
के.एस. पुट्टस्वामी व. भारत सरकार 2017 गोपनीयता का अधिकार गोपनीयता के अधिकार को मौलिक अधिकार माना गया
नवतेज सिंह जोहर व. भारत सरकार 2018 समलैंगिकता को अपराध से मुक्त करना समलैंगिक संबंधों को वैधानिक मान्यता

परीक्षाओं के लिए प्रमुख तथ्य

  • न्यायिक सक्रियता को अक्सर न्यायिक सीमाओं का उल्लंघन करने के लिए आलोचना का सामना करना पड़ता है।
  • PIL न्यायिक सक्रियता का एक प्रमुख साधन है।
  • गोपनीयता का अधिकार को 2017 में मान्यता दी गई।
  • जीवन और जीविका का अधिकार को 1985 में मान्यता दी गई।
  • न्यायिक सक्रियता प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं में बहस का विषय है, जिसे अक्सर संविधानिक कानून और मानव अधिकारों से जोड़ा जाता है।

अंतर: न्यायिक समीक्षा बनाम न्यायिक सक्रियता

पहलू न्यायिक समीक्षा न्यायिक सक्रियता
परिभाषा कानूनों की वैधता की समीक्षा करने की न्यायिक शक्ति नीति और सामाजिक मुद्दों को आकार देने में न्यायपालिका की सक्रिय भूमिका
फोकस यह सुनिश्चित करना कि कानून संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप हैं अधिकारों और सामाजिक न्याय के दायरे का विस्तार
कानूनी आधार अनुच्छेद 13, 226, 32 संविधान की व्याख्या और सार्वजनिक हित
उदाहरण कानूनों को असंवैधानिक घोषित करना नए अधिकारों को मान्यता देना, सामाजिक मुद्दों पर निर्देश जारी करना
विवाद आमतौर पर संवैधानिक कर्तव्य के रूप में देखा जाता है अक्सर अतिक्रमण और न्यायिक अतिक्रमण के लिए आलोचना की जाती है

प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए सारांश

  • न्यायिक समीक्षा एक संवैधानिक तंत्र है जो यह सुनिश्चित करता है कि कानून संविधान के अनुरूप हैं।
  • मूल संरचना सिद्धांत संसद को संविधान में संशोधन करने से रोकता है जिससे इसके मूलभूत सिद्धांत कमजोर हों।
  • न्यायिक सक्रियता में न्यायपालिका सामाजिक और राजनीतिक मामलों में सक्रिय भूमिका निभाती है।
  • PIL न्यायिक सक्रियता का एक प्रमुख उपकरण है।
  • महत्वपूर्ण मामले: केसवानंद भारती (1973), विशाखा (1997), पुट्टस्वामी (2017), नवतेज सिंह जोहर (2018)।