मौर्योत्तर काल
A.7.2 मौर्योत्तर काल
1. शुंग वंश
अवलोकन
- स्थापक: पुष्यमित्र शुंग (लगभग 185 ई.पू. – 78 ई.पू.)
- राजधानी: विदिशा
- उत्तराधिकारी: मौर्य साम्राज्य
- अवधि: लगभग 185 ई.पू. – 78 ई.पू.
प्रमुख विशेषताएँ
- सैन्य शक्ति: सशस्त्र सेना और इंडो-ग्रीक आक्रमण के दमन के लिए प्रसिद्ध।
- धार्मिक नीति: ब्राह्मणवाद को बढ़ावा दिया और वैदिक परंपरा का समर्थन किया।
- प्रशासनिक व्यवस्था: कई मौर्य प्रशासनिक प्रथाओं को बरकरार रखा।
- सिक्के: सोने, चाँदी और तांबे के सिक्के जारी किए जिन पर इंडो-ग्रीक और इंडो-स्किथियन प्रभाव थे।
महत्वपूर्ण तिथियाँ
- स्थापना: लगभग 185 ई.पू.
- समाप्ति: 78 ई.पू.
प्रमुख व्यक्तित्व
- पुष्यमित्र शुंग: संस्थापक और प्रथम शासक।
- देवभूति शुंग: अंतिम शासक, कण्व वंश द्वारा पराजित।
प्रमुख तथ्य (SSC, RRB)
- पुष्यमित्र शुंग ने इंडो-ग्रीक सेनापति डेमेट्रियस प्रथम को पराजित किया।
- शुंग वंश मौर्य प्रशासनिक व्यवस्था की निरंतरता था।
- विदिशा राजधानी थी और प्रशासन व संस्कृति का प्रमुख केंद्र था।
2. कण्व वंश
अवलोकन
- स्थापक: वासुदेव कण्व (लगभग 88 ई.पू. – 58 ई.पू.)
- राजधानी: पाटलिपुत्र
- उत्तराधिकारी: शुंग वंश
- अवधि: लगभग 88 ई.पू. – 58 ई.पू.
प्रमुख विशेषताएँ
- सैन्य शक्ति: अंतिम शुंग शासक देवभूति के विरुद्ध तख्तापलट के माध्यम से स्थापित।
- प्रशासनिक निरंतरता: शुंग और मौर्य साम्राज्यों की प्रशासनिक संरचना को बनाए रखा।
- सांस्कृतिक प्रभाव: हिंदू धार्मिक संस्थाओं की सरंक्षण परंपरा को जारी रखा।
महत्वपूर्ण तिथियाँ
- स्थापना: लगभग 88 ईसा पूर्व
- समाप्ति: 58 ईसा पूर्व
प्रमुख व्यक्तित्व
- वासुदेव कण्व: संस्थापक और प्रथम शासक।
- वासुदेव कण्व अंतिम शुंग शासक देवभूति के मंत्री थे।
प्रमुख तथ्य (SSC, RRB)
- कण्व वंश एक अल्पकालिक वंश था जिसने शुंगों को प्रतिस्थापित किया।
- वासुदेव कण्व एक मंत्री थे जिन्होंने शुंगों से सत्ता छीन ली।
- कण्व वंश अपने संक्षिप्त शासन और उल्लेखनीय सांस्कृतिक या राजनीतिक विकास की कमी के लिए जाना जाता है।
3. सातवाहन वंश
अवलोकन
- स्थापना: सातकर्णी द्वारा (लगभग 2ठी सदी ईसा पूर्व – 2ठी सदी ईस्वी)
- राजधानी: पैठण (औरंगाबाद)
- उत्तराधिकारी: मौर्य साम्राज्य (दक्कन और दक्षिण भारत के कुछ भागों में)
- अवधि: लगभग 2ठी सदी ईसा पूर्व – 2ठी सदी ईस्वी
प्रमुख विशेषताएँ
- क्षेत्रीय विस्तार: दक्कन और दक्षिण भारत के कुछ भागों पर नियंत्रण बढ़ाया।
- सांस्कृतिक योगदान: संस्कृत भाषा, सिद्धांत खगोल विज्ञान, और संस्कृत साहित्य के विकास को बढ़ावा दिया।
- सिक्के: प्राकृत, संस्कृत, और यूनानी भाषाओं में लेख के साथ सिक्के जारी किए।
- धार्मिक नीति: बौद्ध धर्म और हिंदू धर्म दोनों का समर्थन किया।
महत्वपूर्ण तिथियाँ
- स्थापना: लगभग 2ठी सदी ईसा पूर्व
- समाप्ति: लगभग 2ठी सदी ईस्वी
प्रमुख व्यक्तित्व
- सातकर्णी: सबसे प्रमुख शासकों में से एक, जो अपनी सैन्य अभियानों और सांस्कृतिक संरक्षण के लिए जाने जाते हैं।
- गौतमीपुत्र सातकर्णी: एक उल्लेखनीय शासक जिसने राज्य का विस्तार किया और गुप्त अभिलेखों में उल्लिखित है।
प्रमुख तथ्य (SS. C, RRB)
- सातवाहन वंश को शातवाहन वंश के नाम से भी जाना जाता है।
- गौतमीपुत्र सातकर्णी को इस वंश के महानतम शासकों में से एक माना जाता है।
- सातवाहन वंश अपनी सिक्कों, साहित्यिक योगदान और धार्मिक सहिष्णुता के लिए जाना जाता है।
- सातवाहन वंश को अक्सर बौद्ध परंपरा और गुप्त अभिलेखों से जोड़ा जाता है।
4. चेदि वंश
अवलोकन
- स्थापना: चेदि द्वारा (लगभग 2ठी सदी ईसा पूर्व – 1ठी सदी ईस्वी)
- राजधानी: सुख्तिमती
- उत्तराधिकारी: मौर्य साम्राज्य (दक्षिण भारत के कुछ भागों में)
- अवधि: लगभग 2ठी सदी ईसा पूर्व – 1ठी सदी ईस्वी
प्रमुख विशेषताएँ
- क्षेत्रीय नियंत्रण: दक्षिण भारत के कुछ भागों पर नियंत्रण, जिसमें कलिंग क्षेत्र शामिल था।
- सांस्कृतिक योगदान: संस्कृत, बौद्ध धर्म और स्थानीय परंपराओं के विकास को बढ़ावा दिया।
- प्रशासनिक प्रणाली: मौर्य प्रशासनिक संरचना के तत्वों को बनाए रखा।
- सिक्के: प्राकृत और संस्कृत में अभिलेखों वाले सिक्के जारी किए।
महत्वपूर्ण तिथियाँ
- स्थापना: लगभग 2ठी सदी ईसा पूर्व
- समाप्ति: लगभग 1ठी सदी ईस्वी
प्रमुख व्यक्तित्व
- चेदि: वंश का संस्थापक।
- चेदि शासकों का उल्लेख गुप्त अभिलेखों और बौद्ध ग्रंथों में मिलता है।
प्रमुख तथ्य (SSC, RRB)
- चेदि वंश को चेदि वंश के नाम से भी जाना जाता है।
- चेदि वंश ने दक्षिण भारत के कुछ भागों पर शासन किया और यह बौद्ध परंपरा से जुड़ा हुआ है।
- चेदि वंश अपने सिक्कों और सांस्कृतिक योगदान के लिए जाना जाता है।
- चेदि वंश को अक्सर गुप्त अभिलेखों और बौद्ध साहित्य से जोड़ा जाता है।
तुलना सारणी: शुंग, कण्व, सातवाहन और चेदि वंश
| वंश | संस्थापक | अवधि | राजधानी | प्रमुख विशेषताएँ | धार्मिक नीति | सांस्कृतिक योगदान |
|---|---|---|---|---|---|---|
| शुंग | पुष्यमित्र | 185 ई.पू. – 78 ई.पू. | विदिशा | सैन्य शक्ति, ब्राह्मणवाद | ब्राह्मणवाद को बढ़ावा दिया | सिक्के, भारत-यूनानी प्रभाव |
| कण्व | वासुदेव कण्व | 88 ई.पू. – 58 ई.पू. | पाटलिपुत्र | प्रशासनिक निरंतरता | हिंदू अनुशंसा जारी रखी | सीमित सांस्कृतिक प्रभाव |
| सातवाहन | सातकर्णि | 2ठी शताब्दी ई.पू. – | प्रतिष्ठान | सांस्कृतिक और धार्मिक सहिष्णुता | बौद्ध धर्म और हिंदू धर्म दोनों को समर्थन | संस्कृत, खगोलशास्त्र, साहित्य |
| चेदि | चेदि | 2ठी शताब्दी ई.पू. – | सुख्तिमती | क्षेत्रीय नियंत्रण, बौद्ध अनुशंसा | बौद्ध परंपरा | सिक्के, स्थानीय परंपराएँ |